रिपोर्टर : ए के तिवारी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष
आधी रात थी। मथुरा की जेल में सन्नाटा था।
एक ओर सत्ता का अहंकार था, दूसरी ओर एक ऐसा शिशु जन्म लेने वाला था, जिसके हाथ में न तलवार थी, न सेना। लेकिन उस रात जन्म लेने वाला बालक आगे चलकर ऐसा नाम बनने वाला था, जिसे हजारों वर्षों बाद भी भारत का बच्चा अपनी लोरी में सुनता है, मां अपने लड्डू गोपाल में देखती है, प्रेम करने वाला राधा-कृष्ण में महसूस करता है, योद्धा गीता में मार्गदर्शन खोजता है और परेशान इंसान आज भी कह उठता है—
“हे कृष्ण, अब रास्ता बताइए…”
यही श्रीकृष्ण हैं।

और शायद यही वजह है कि जन्माष्टमी केवल भगवान के जन्म का उत्सव नहीं है।
यह उम्मीद के जन्म का उत्सव है।
कहानी जेल से शुरू होती है, लेकिन खत्म मनुष्य के भीतर होती है
हिंदू धार्मिक ग्रंथों की परंपरा के अनुसार मथुरा के राजा कंस को भविष्यवाणी मिली कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान उसके विनाश का कारण बनेगी।
भय इतना बढ़ा कि कंस ने अपनी ही बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।एक-एक करके संतानों का जन्म हुआ और कंस उन्हें मारता गया।फिर वह रात आई जिसे आज जन्माष्टमी के रूप में याद किया जाता है।

परंपरा के अनुसार देवकी के गर्भ से कृष्ण का जन्म हुआ और वसुदेव उन्हें लेकर यमुना पार गोकुल पहुंचे, जहां उनका पालन-पोषण नंद और यशोदा के घर हुआ।यह कथा धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से मिलती है।
लेकिन कृष्ण की कहानी का एक दिलचस्प पहलू यह है कि कृष्ण-वासुदेव की पूजा केवल बाद के समय की बनी हुई परंपरा नहीं दिखाई देती।
बेसनगर के प्रसिद्ध हेलियोडोरस स्तंभ का अभिलेख दूसरी शताब्दी ईसा-पूर्व में वासुदेव के सम्मान में स्तंभ स्थापित किए जाने की गवाही देता है। एक यूनानी राजदूत हेलियोडोरस स्वयं को वासुदेव का भक्त बताता है।अर्थात कृष्ण की भक्ति की जड़ें भारत के बहुत प्राचीन इतिहास में दिखाई देती हैं।कथा की हर घटना को आधुनिक इतिहासकार प्रमाणित कर दें—यह कहना सही नहीं होगा।

कृष्ण ने सबसे पहले राजमहल नहीं, एक गांव चुना
यह कृष्ण की कहानी का शायद सबसे खूबसूरत हिस्सा है।वे राजपरिवार में जन्मे, लेकिन उनका बचपन महलों में नहीं बीता। वे गोकुल पहुंचे। वहां उनके साथ गायें थीं, ग्वाल-बाल थे, यशोदा मैया थीं, नंद बाबा थे और गांव की वही साधारण जिंदगी थी जिसमें कभी माखन की मटकी टूटती थी तो कभी पूरा गांव कृष्ण की शरारतों पर मुस्कुराता था।यहीं कृष्ण हमें एक ऐसी बात सिखाते हैं जिसे आज की जिंदगी में हम अक्सर भूल जाते हैं— बड़ा बनने के लिए बड़ा दिखना जरूरी नहीं है।

कृष्ण के सिर पर मुकुट बाद में आया। पहले उनके सिर पर मिट्टी लगी। पहले उन्होंने राजसिंहासन नहीं, गांव की गलियां देखीं। पहले उन्होंने सत्ता नहीं, लोगों का प्रेम पाया।शायद इसीलिए कृष्ण सिर्फ मंदिरों के भगवान नहीं बने।
वे घरों के कृष्ण बन गए।
किसी के लिए लड्डू गोपाल,
किसी के लिए कान्हा,
किसी के लिए मुरलीधर,
किसी के लिए गोविंद,
और किसी के लिए केवल अपना “श्याम”।

माखन चुराने वाला कृष्ण हमें क्या बताता है?
कृष्ण को “माखन चोर” कहकर बच्चे हंसते हैं। लेकिन कृष्ण की बाल लीलाओं को केवल शरारत समझकर छोड़ देना शायद उस कथा के अर्थ को छोटा कर देना है। माखन उस समय घर की मेहनत और समृद्धि का प्रतीक था। कृष्ण का लोगों के घरों में जाना, उनसे जुड़ना और उनके जीवन का हिस्सा बन जाना—इसीलिए उनकी बाल छवि इतनी लोकप्रिय हुई। कृष्ण ने भगवान और भक्त के बीच दूरी कम कर दी। उन्होंने यह नहीं कहा कि भगवान तक पहुंचने के लिए केवल राजमहल चाहिए। उन्होंने गांव की गलियों में यह संदेश दिया कि— ईश्वर को पाने के लिए आपका घर छोटा या बड़ा नहीं, आपका मन बड़ा होना चाहिए।

फिर वही कृष्ण सामने आते हैं—लेकिन इस बार हाथ में मुरली नहीं, जिम्मेदारी है
बालक कृष्ण जब बड़े हुए तो कहानी बदल गई। कंस का अत्याचार बढ़ा। कृष्ण मथुरा लौटे और धार्मिक परंपरा के अनुसार कंस का अंत किया। लेकिन कृष्ण की सबसे बड़ी परीक्षा शायद इसके बाद शुरू हुई। महाभारत में वे केवल योद्धा नहीं बने। वे अर्जुन के सारथी बने। सोचिए— जिस व्यक्ति को लोग भगवान मानते हैं, वह स्वयं रथ चला रहा है। यही कृष्ण की सबसे बड़ी खूबसूरती है। उन्होंने नेतृत्व को सिंहासन पर बैठकर आदेश देना नहीं, जरूरत पड़ने पर किसी और का रथ चलाना बताया।

कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने युद्ध से पहले इंसान को समझाया
महाभारत की परंपरा में जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने ही संबंधियों को सामने देखते हैं तो उनका मन विचलित हो जाता है। तब कृष्ण उन्हें जीवन, कर्तव्य, आत्मा, कर्म और धर्म के बारे में समझाते हैं। यही संवाद आगे चलकर भगवद्गीता के रूप में प्रसिद्ध हुआ। कृष्ण का संदेश केवल यह नहीं था कि “युद्ध करो।” उससे कहीं बड़ा संदेश था— जब जीवन आपको कठिन निर्णय के सामने खड़ा करे, तब डर के कारण अपने कर्तव्य से भागना समाधान नहीं है। कृष्ण ने कर्म की बात की। फल की चिंता में डूब जाने के बजाय अपने कर्म को सही तरीके से करने की बात की और यही कारण है कि हजारों वर्ष पुरानी गीता आज भी आधुनिक इंसान की जिंदगी में प्रासंगिक लगती है।

कृष्ण की सबसे बड़ी शक्ति उनका चक्र नहीं था
हम कृष्ण को सुदर्शन चक्र के साथ देखते हैं। लेकिन अगर उनकी पूरी जीवन-कथा को देखें तो उनकी सबसे बड़ी शक्ति शायद उनका विवेक था। वे जानते थे— कब मुस्कुराना है। कब मुरली बजानी है। कब मित्र बनना है। कब शांति का प्रयास करना है। कब अन्याय के सामने खड़ा होना है। और कब स्वयं पीछे रहकर किसी दूसरे को आगे बढ़ाना है। यही कृष्ण हैं।
प्रेम भी, नीति भी।
मुस्कान भी, संघर्ष भी।
मुरली भी, सुदर्शन भी।

और शायद इसलिए कृष्ण हर वर्ग के हैं
बच्चे उन्हें बाल गोपाल में देखते हैं। युवा उन्हें प्रेम और मित्रता में देखते हैं। माता उन्हें अपने बच्चे में देखती है। पिता उन्हें जिम्मेदारी में देखते हैं। किसान उन्हें गोपाल के रूप में देखते हैं। गरीब उन्हें अपना सहारा मानता है। विद्वान गीता में उन्हें खोजता है। भक्त मंदिर में उन्हें पाता है। और परेशान इंसान… वह आंखें बंद करके बस इतना कहता है—
“कृष्ण, अब आप ही संभालिए।”

इस जन्माष्टमी पर केवल झांकी न सजाएं
इस बार घर में कृष्ण की मूर्ति सजाते समय एक सवाल खुद से भी पूछिए— क्या हमारे घर में कृष्ण की तस्वीर तो है, लेकिन उनके विचार भी हैं?
क्या हम अपने बच्चों को केवल माखन चोर की कहानी सुनाते हैं, या यह भी बताते हैं कि कृष्ण ने मित्रता निभाना, अन्याय का सामना करना और कठिन समय में सही निर्णय लेना सिखाया? क्या हम जन्माष्टमी पर मंदिर जाते हैं, लेकिन अपने आसपास किसी परेशान इंसान के लिए दो कदम चलने को तैयार हैं? क्योंकि अगर कृष्ण केवल मंदिर में रह गए, तो हमने कृष्ण को बहुत छोटा कर दिया।
कृष्ण तो वहां भी हैं जहां कोई निराश होकर उम्मीद खोज रहा है।

कृष्ण का जन्म आधी रात में हुआ था…
शायद यह भी इस पर्व का सबसे सुंदर संदेश है। अंधेरी रात में जन्म लेने वाला कृष्ण हमें याद दिलाता है कि— अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, सुबह को आने से कोई रोक नहीं सकता। कंस चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, अन्याय हमेशा नहीं टिकता। मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी हों, रास्ता कहीं न कहीं निकलता है। और इंसान चाहे कितना भी टूट जाए— उसके भीतर उम्मीद फिर जन्म ले सकती है। इसी उम्मीद का नाम कृष्ण है। इसी प्रेम का नाम कृष्ण है। इसी विवेक का नाम कृष्ण है। और शायद इसी कारण हजारों वर्षों बाद भी जब जन्माष्टमी की रात मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में दीप जलते हैं और बच्चे कृष्ण बनकर मुस्कुराते हैं—तो लगता है जैसे मथुरा की वह आधी रात फिर लौट आई हो।
एक बार फिर अंधेरे के बीच कोई कह रहा हो—
“डरो मत… मैं आ गया हूं।”

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
जय श्रीकृष्ण 🙏🔔🙏
[ध्यान दे ! इस भक्तिमय स्टोरी कही कोई भी त्रुटि हुई हो तो क्षमा करते हुए उसे सुधार कर पढ़ें]





