(एडिटेड बाई: ए के तिवारी जौनपुर
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनावों का पारा अभी से चढ़ने लगा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राज्य की सत्ता में वापसी के लिए अपनी पुरानी रणनीति को पूरी तरह से री-इन्वेंट (Re-invent) करना शुरू कर दिया है। यादव-मुस्लिम (MY) समीकरण की पारंपरिक वैतरणी पार करने वाली समाजवादी पार्टी अब एक बिल्कुल ही नए और धारदार सामाजिक समीकरण पर काम कर रही है।

🎯 क्या है अखिलेश यादव का नया मास्टरप्लान?
सपा का मुख्य फोकस अब अपने चर्चित PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के दायरे को और ज्यादा विस्तार देना है। इसके तहत पार्टी की दो सबसे बड़ी रणनीतिक दिशाएं तय की गई हैं:
- ‘पंडित’ कार्ड और ब्राह्मणों की गोलबंदी: अखिलेश यादव पहले ही अपने पीडीए के दायरे को बढ़ाते हुए ‘पी’ (पिछड़ा) को ‘पंडित’ यानी ब्राह्मण समाज से जोड़ चुके हैं। सपा का मकसद रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़कर सवर्ण जातियों, खासतौर पर ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचना है।
- गैर-जाटव दलितों पर पैनीनजर: दलित राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को ध्वस्त करते हुए सपा अब जाटव-इतर (Non-Jatav) जातियों को साधने में जुटी है, ताकि बहुजन वोटबैंक में एक बड़ी सेंध लगाई जा सके।

जमीनी स्तर पर कैसी है तैयारी?
सिर्फ जुबानी जमाखर्च की बजाय इस रणनीति को अमली जामा पहनाने के लिए पार्टी ने संगठन स्तर पर भी गियर बदल दिए हैं:
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- संगठन में हिस्सेदारी: ब्राह्मण समाज को सिर्फ लुभावने वादे देने के बजाय उन्हें पार्टी संगठन और समितियों में ठोस प्रतिनिधित्व देने का काम तेजी से किया जा रहा है।
- संवाद और संपर्क अभियान: गैर-जाटव दलित जातियों और ब्राह्मणों के बीच छोटे-बड़े सम्मेलनों, बैठकों और संवाद कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू कर दी गई है ताकि उनके स्थानीय मुद्दों को सीधे पार्टी एजेंडे में शामिल किया जा सके।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में बिना सवर्ण और दलित गठजोड़ के सत्ता के शिखर तक पहुंचना किसी भी दल के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अखिलेश यादव की यह ‘नई सोशल इंजीनियरिंग’ सिर्फ कागजी बयानबाजी साबित होगी या फिर 2027 के चुनावी मैदान में यह गेम-चेंजर बनकर उभरेगी?
क्या आपको लगता है कि अखिलेश यादव का यह नया समीकरण बीजेपी के मजबूत सामाजिक ताने-बाने को भेद पाएगा?





